मुक्तक
जिसे हमने सिखाया था,वही हमको सिखाते हैं।
हमारे चाल में गलती,सदा हमको बताते हैं।
उसे सायद नही है ज्ञान, होता है तजुर्बा क्या।
नया आया जमाना तो,हमे ओ आजमाते हैं।
अदावो में शरारत है,शरारत में नजाकत है।
नजाकत चाल में ऐसी,खुदा की ओ इनायत है।
शुभानल्ला कहे जो भी,नजर भर देख ले तुझको।
बला की खूबसूरत चाँद ले आया कयामत है।
उसे कहदो हमारी राह पे,काँटे बिछाने को।
बिछे जो फूल राहों पर,अभी उसको हटाने को।
हमें ओ मखमली राहें,विरासत में नही चाही।
बने कुछ अटपटे किस्से,बुढापे में बताने को।
गगन में चाँद को देखा,खुशी पाया मगर था चंद।
धरा पर देख कर तुझको,खुली आँखे हुई ना बंद।
कयामत ढा रही हो तुम,हकीकत हो कि हो सपना।
महकती फूल सी खुशबू,बिखरती हो लगे मकरंद।
गुनाहों को छुपाना है,करो फिर से गुनह कोई।
जमाने को दिखाना है,करो फिर से गुनह कोई।
मिला है ताज उनको ही,चले जो लाश के ऊपर।
किसी को जब हँसाना है,करो फिर से गुनह कोई।
हमे मालूम है सबकुछ,मगर हम कुछ नही कहते।
रहे हम मौन दुनिया में, सभी के रंजो गम सहते।
सताये हैं जमाने के, कहें तो क्या भला बोलो।
किसी को दिख नही पाता, हमारे आँख जो बहते।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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