घनाक्षरी
जब से कोरोना आया, दाढ़ी मूँछ देखो छाया,
नाई न मिले हैं भाई,बड़ा ही जंजाल है।
जंगल सरीखे घना, मोटा मोटा हुआ तना,
खुरदुरा हुआ देखो, मेरा पूरा गाल है।
कुछ काले काले दिखे, लगते तेंदू सरीखे,
सादे सादे बाँकी सारे, घाँस है कि बाल है।
पहचान खो न जाऊँ, यही सोंच घबराऊँ,
बाबा न समझ बाई, करे बुरा हाल है।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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