जयकारी छंद
तहीं बता का होही मोर।
मन मा उमड़त हवय हिलोर।
बासी झटकुन देदे बोर।
दाई पइयां लागँव तोर।
मुसुवा कूदत हावय पेट।
बरतन भाड़ा तुरत समेट।
दाई अब झन कर तँय लेट।
बाँगा सँग करले तँय भेंट।
तनिक मही देबे तँय डार।
अउ आमा के लान अचार।
मुसुवा झट मँय देवँव मार।
पेट भरे तब हो उद्धार।
बासी महिमा अगम अपार
खावय मनखे मार डकार।
छत्तीसगढ़ के व्यंजन सार।
जन जन ला देवत हे तार।
दिलीप कुमार वर्मा
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