गजल
122 122 122
उमर भर करव जी पढ़ाई।
बने सीख लेवव कढ़ाई।
कहूँ टूट गे फइरका हर।
बनाये बलाले बढ़ाई।
उठाये रबे बोझ कबतक।
जमी मा अभी दे मढ़ाई।
निहारव न सूरत ल भाई।
निहारव करे जे कढ़ाई।
सहत ले सहे जात हावय।
तहाँ फिर करे सब चढ़ाई।
दिलीप कुमार वर्मा
No comments:
Post a Comment