Thursday, 23 April 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

122 122 122 

किसनहा ह रोवत हवय जी। 
तभो धान बोवत हवय जी।  

बदे बैल सँग हे मितानी। 
तभे भूँस मोवत हवय जी।  

लगे बेर जानत हे दाई।
अँगाकर ल पोवत हवय जी। 

चलत हे गरीबी गुजारा।  
बहुत दुःख ढोवत हवय जी। 

बहे जेन आँसू नदी कस। 
उही तन ल धोवत हवय जी। 

सदा टोर जाँगर कमाथे। 
कहाँ अन्न होवत हवय जी। 

सबो जानथे ओ विधाता।
तभो देख सोवत हवय जी। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़




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