गजल-दिलीप कुमार वर्मा
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किसनहा ह रोवत हवय जी।
तभो धान बोवत हवय जी।
बदे बैल सँग हे मितानी।
तभे भूँस मोवत हवय जी।
लगे बेर जानत हे दाई।
अँगाकर ल पोवत हवय जी।
चलत हे गरीबी गुजारा।
बहुत दुःख ढोवत हवय जी।
बहे जेन आँसू नदी कस।
उही तन ल धोवत हवय जी।
सदा टोर जाँगर कमाथे।
कहाँ अन्न होवत हवय जी।
सबो जानथे ओ विधाता।
तभो देख सोवत हवय जी।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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