Monday, 20 April 2020

आल्हा

आल्हा- दिलीप कुमार वर्मा 

फइलत हावय जे महमारी, तेखर कथा सुनावँव आज। 
कतका खतरा बाढ़त हावय, मण्डरावत हे बनके बाज। 

जाने कोन जगा ले आये, कुछ दिन मा दुनिया भर छाय।
दहलावत हे रार मचावत, जाने कहाँ तलक ये जाय। 

सात समंदर पार पहुँचगे, नइ बाँचत हे कोनो छोर। 
कोरोना के महमारी ले, दुनिया भर मा माते सोर। 

लगे बवंडर कस कोरोना, शहर नगर ला देत उड़ाय।
जात पात नइ देखय भाई, काल बने ये सब ला खाय।

जिहाँ जिहाँ कोरोना जावय, तिहाँ तिहाँ बनगे समशान। 
मरे रोवया नइ बाँचत हे, शहर नगर होगे वीरान। 

अजर अमर अविनासी लागय, अमर बेल जस बाढ़त जाय। 
छूत बरोबर ये महमारी, साबुत मनखे तक ला खाय। 

बात कहत लाचार करत हे, हाथ मिलावत तन मा आय।
एक जगा ले दुसर जगा मा, चढ़ समान ओ तुरते जाय।

दिखय नही ये ततका छोटे, पर मनखे ला मात खवाय। 
ये तन आवत स्वांसा रुक जय, तड़फ तड़फ मनखे मर जाय। 

कतको मनखे खटिया धरलय, कतको मनखे यमपुर जाय। 
पर मनखे कहना नइ मानय, अइसन सँवहत रहे झपाय।

साँस लेत मा हो परसानी, सुक्खा खाँसी सर्दी आय। 
अउ बुखार मा तन हर तीपय, लच्छन येखर इही बताय।

अइसन हे ता जाँच करावव, डॉक्टर ले तुरते मिल आव।
कहना ला डॉक्टर के मानव, कोरोना ले जान बचाव। 

सुनत हवन बिन लच्छन के जी, कोरोना तन मन रह जाय।
सोचव खतरा कतका हावय, कइसे करके जान बचाय।

दुनिया भर समझावत हावय, घर ले बाहिर झन गा जाव। 
जभे जरूरी तब्भे निकलव, मुँह मा सुग्घर मास्क लगाव। 

भीड़ भाड़ ले दुरिहा राहव, रहव एक मीटर जी दूर। 
बार बार साबुन ले भाई, धोना हावय हाथ जरूर। 

कोरोना तब घर नइ आवय, शासन के कहना ला मान। 
अपन सुरक्षा हाथ अपन हे, खतरा ला अब तो पहिचान।

डॉक्टर जान लगाये हावय, खड़े करोना यम के बीच। 
नर्स तको मन साथ चलत हे, जिनगी मा अमरित दय छींच। 

खड़े सिपाही छाती ताने, कोरोना ला दय ललकार। 
तुहरो जान बचाये खातिर, समझावत हे बारम्बार। 

भूत लात के बात न माने, देत सिपाही डंडा मार। 
बिन बुद्धि के मनखे मन ले, देव तको हर जावय हार। 

पर इन ला हे जान बचाना, करना अपन हवय जी काम।
आसा हे कोरोना मरही, तब्भे पाही यहू अराम।  

आशा ले आकाश थमे हे, आशा ले बरसा हो जाय। 
रख लव आशा मन मा भाई, कोरोना हर बच नइ पाय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा  
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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