मटकावत हे गगरी धर के चिखला फदके जब हावय पाँव। बिछले जब पाँव गिरे फद ले अब सोंचत हे कइसे घर जाँव। फुटगे गगरी चमके बिजुरी कइसे करके भरके जल लाँव। नइ सूझत आज गुवालिन ला,मुख ढाँकन आज मिले नइ छाँव। दिलीप
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