Saturday, 9 January 2021

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212

बिठाय नाव मा बहुत करत नदी ल पार हे। 
सम्हल-सम्हल चलात हे जबर नदी के धार हे। 

बनाय हौसला चले पहाड़ मुड़ नवाय जी। 
अगर कहूँ डराय जान ले तहाँ ग हार हे। 

बड़ा विचित्र हाल होय लोक तंत्र मा तको।
चलाय देश ला तको कहे कि जे गँवार हे। 

लकर धकर करे कका अतेक काय हड़बड़ी। 
सम्हल-सम्हल के रेंग नइ ते गिर जबे उतार हे। 

नशा करे दिमाक नास हो जथे ये जान ले।
पता चले नही नशा म एक हे कि चार हे। 

कभू सजे सजाय हाट बाट गाँव के रहे।
शहर डहर चले सबो त गाँव सब उजार हे। 

बढ़े हवय जी दाम आज खाय के समान के।
उलझ नही ते साग बर बने हवय जी दार हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


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