Friday, 29 January 2021

सवैया

किरीट सवैया

सोंचत हे मछरी तक काँपत का करके मँय रात बितावँव। 
बाढ़त हे अब जाड़ तको तरिया सँग मा कहुँ ना जम जावँव। 
मोर खुराक तको नइ हे अब खोज कहाँ मँय भूख मिटावँव।
शॉल मिले न मिले अँगरा कइसे करके अब जान बचावँव। 

7 भगन +तगन

बाहिर जा सकतेंव कहूँ ककरो कथरी रजिया म लुकातेंव। 
खाय तको मिलतीस तहाँ चुपके-चुपके तनियावत खातेंव। 
रोज नवा परिधान लपेट दिखावत लोगन ला इतरातेंव। 
जाड़ लगे अबड़ेच तहाँ अँगरा खुसरे मँय जान बचातेंव।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

No comments:

Post a Comment