घनाक्षरी ( सोन चिरइया )
सोन के चिरइया मोर, पिंजरा म बंद रहे,
तड़फत रहे सदा, होये ल अजाद रे।
उड़ियाना चाह के भी, उड़ वो सके न कभू,
काखर करा ले करे, भला फरियाद रे।
सुत तो सपूत रहे, काम ले कपूत रहे,
आपस म लड़ मरे, लालची औलाद रे।
परदेशी कौवा आये, छीन-छीन सब खाये,
डरा धमका के सबो, होवत अबाद रे।
कौवा करे काँव-काँव, दिन रात हाँव- हाँव,
सबो परेसान रहे, कइसे के भगाय रे।
धात-धात माने नही, प्रेम भाषा जाने नही,
चाबे बर दौड़ पड़े, तिर तार आय रे।
सोन के चिरइया बर, फूल भेजे घर-घर,
सबो एक साथ मिल, आवाज उठाय रे।
धर के मशाल चले, आपस मा मिले गले,
कौवा ला भगाये बर, उदिम बताय रे।
धीरे-धीरे एकता के, सूत म बँधाये सबो,
कौवा ला भगाये बर, करे तइयार हे।
कोनो शांति राह चल, करत आंदोलन हे,
कतको लड़े लड़ाई, करे आर पार हे।
मार काट मचे भारी, सालों साल युद्ध जारी,
दूनो कोती मरे पर, कहाँ माने हार हे।
लाखों बलिदान दे के, हजारों के जान लेके,
सोन के चिरइया बर,खोले संसार हे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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