Friday, 8 January 2021

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 1122 22   

आज कल नौकरी कोनो इहाँ पावत नइ हे। 
योजना तक नवा सरकार बनावत नइ हे। 

श्याम राधा के बिना कइसे बजाही मुरली। 
नाम के छोड़ कछू ध्यान म आवत नइ हे।  

रोज बिहना के उठे काम ल करते रहिथौं।  
सास मोला तभो ले देख तो भावत नइ हे।  

नेवता पाय के घर आये सुवागत हावय।  
काम हर हो गये अब जाव जी दावत नइ हे।

ये करोना के ग रोना बता कब तक रइही। 
कोनो वैक्सीन बना झट ले इहाँ लावत नइ हे। 

बोझ बन गे हवे अब काय बतावँव तोला।
आय मिहमान ह रतियाय गे जावत नइ हे।

का पता काय धरे बोझ अपन मन भीतर। 
लान रख दे हवँव खाना तभो खावत नइ हे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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