Tuesday, 19 January 2021

गजल

ग़ज़ल - दिलीप कुमार वर्मा

बहरे हजज़ मुसमन अख़रब मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ मक्फ़ूफ महज़ूफ़
मफ़ऊल मुफ़ाईल मुफ़ाईल फ़ऊलुन

221 1221 1221 122

लालच म फँसे तँय कका का पाय ठगा के।   
कतको रखे चिरमोट वो ले जाही नगा के।

माटी के बने देह हा माटी म समाही। 
फोकट करे अभिमान तें मेंकब ल लगा के। 

सोना के महल मोर करा एक रहिस हे।  
जम्मो ल उझारे कका मोला ते जगा के।

पतवार के बिन नाव चलाबे भला कइसे। 
तँय घाट ला हथिया डरे मजदूर भगा के।

बइठे बबा काँपत हवे नइ शॉल न स्वेटर।
जाड़ा ल भगावत हवे बीड़ी ल दगा के। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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