सार छंद
मोरो दर मा आये राहय,बड़का एक भिखारी।
हाथ जोर ओ माँगत राहय,जाने का लाचारी।
पहिनावा सब उज्जर उज्जर,दस झन सँग मा साथी।
ढोल बजावत आये दर मा,जइसे हो बाराती।
कहिथे मोला एक बार तो,मउका दे दव भाई।
सबो काम ला तुँहर बनाहूं, झन समझव हरजाई।
बोली मा तो मिसरी घोरे,माँगन आय दुवारी।
मउका पा के शेर बने फिर,निसदिन चले कटारी।
बड़का घर के बड़े भिखारी,छोटे घर मा आवय।
हाथ जोड़ के मूँड़ नवावय, पाँव तको परजावय।
दाई माई भइया भौजी,नाता सबो बनावय।
एक एक घर जा-जा जाके,अबड़े उन गुहरावय।
तुँहर भरोसा खड़े हवँव मँय,अब हे तुँहरो बारी।
जे चाही सब ले लव भइया,झन दव मोला गारी।
पइसा कौड़ी कपड़ा लकता,या पीले तँय दारू।
कुकरी बकरा जतका खाले,सुनले तनिक बुधारू।
बिछिया चुटकी पैजन लेले,या लुगरा रख दाई।
कम्बल स्वेटर शॉल ओढ़ ले,सुन ले गा मोर भाई।
सब कोती खुशहाली लाहूँ, नइ गा रहे उधारी।
काबर मँय हा आये हावँव,समझव सब लाचारी।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
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