Wednesday, 1 August 2018

रूप घनाक्षरी

लबरा मारे लबारी,बात कहे बारी बारी,
सुनत मोकाये संगी, देये रथे सबो कान।
मिरच मशाला डारे,मीठ मीठ दे उतारे,
सुने सब मुँह फारे, मोहनी खवाये मान।
साँच साँच सबो लागे,रहे चासनी म पागे,
सुध बुध ला भुलागे,जेन सुने तेने जान।
बात गुन लेहु भाई,कतका रहे सच्चाई,
सच अउ लबारी के,कर लेहु पहिचान।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

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