मनहरण घनाक्षरी
भूत ला भगाये बर, करथे प्रपंच भारी,
आनी बानी टोटका ला,हम ला देखाय जी।
राख के भभूत धरे,मंतर कहन लागे,
मिरचा ला आगी डार, नीबू काटे जाय जी।
धुँवा ला देखावय भारी,लीम डारा मारी मारी,
मानो जस भूत धरे, चुन्दी चुंदियाय जी।
भागे न भरम भूत,नो हे रकसा के दूत,
जाने सब दुनिया हा, पर ओ ठगात हे।
दिलीप कुमार वर्मा
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