चिखला
बरसा के दिन हर जब आय।
चारो कोती चिखला छाय।
खेत खार रसता चिखलाय।
खोर गली अँगना भरजाय।
चिखला रहना हावय आम।
कपड़ा लकता होय तमाम।
जे हर दउड़े गिरे धड़ाम।
जेखर चिखला हावय नाम।
फद फिद फद लइका हर जाय।
भइसा जइसन ओ चिखलाय।
रोहन बोहन घर मा आय।
दाई ले फिर गारी खाय।
मजा तको आथे बड़ मान।
हरे खिलौना चिखला जान।
गाँव गली के ये पहिचान।
धरती के ये मया समान।
रचानाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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