गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महजूफ़
मुफ़ाइलुन फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फेलुन
1212 1122 1212 22
चमक दमक रखे अपने मकान को साहिब।
उड़ा दिए जो मिला था ओ दान को साहिब।
बिना चमक के न बिकता यहाँ कभी कुछ भी।
सजा-सजा सदा रखना समान को साहिब।
चमक उठा कभी तलवार जो निकल बाहिर।
ओ म्यान में तभी जाए ले प्राण को साहिब।
चमक-चमक के घटा से निहारती बिजली।
कभी-कभी चला देती है बान को साहिब।
सुहानी रात में चमके हजार तारें भी।
करें प्रकाश अँधेरे जहान को साहिब।
हरेक चीज जो चमके नही ओ हो हीरा।
चमक के काँच भी लूटे नदान को साहिब।
चमकती रोशनी सबको करीब लाती है।
"दिलीप'' सोंच के भरना उड़ान को साहिब।
रचानाकार--दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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