Wednesday, 23 September 2020

दोहा

माटी

मैं माटी के पूत हँव, माटी सेवा काम। 
जबतक तन में जान हे, करँव नही आराम।

निशदिन जाँगर पेर के, भरे हवँव खलिहान। 
दुश्मन के आँखी गड़े, मारत रहिथे बान। 

अछरा ला मइलाय बर, चिखला देथे फेंक। 
बने सिपाही तन जथौं, तुरते देथौं छेंक।

लहरावत सब देख के, बैरी मन जल जाय।  
टिड्डा माहूं कस इहाँ, चुपके चुपके आय। 

माटी ला सिरजाय बर, हाजिर तन मन प्राण। 
पग काँटा कतको गड़े, कतको पर जय बाण। 

माटी ले मँय हँव बने, दुनिया माटी मोर। 
माटी मा ही मिल जहूँ, माटी तन मा जोर। 

माटी पावन हे हमर, जिहाँ जीव अम्बार।  
मिलजुल के रहिथन सबो, जइसे हो परिवार। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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