सुंदरी सवैया
मनमोहन के मुरली सुन के, सुध गोप गुवालिन के बिसरागे।
जस हाल रहे तस हाल सखा दउड़े सब जंगल बीच म आगे।
सब रास रचावत हे मिल के, रतिहा जब बीत जथे तब जागे।
मन आंनद पा मुसकावत हे, सुध आय तहाँ घर जावय भागे।
रचानाकार--दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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