Friday, 11 September 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मज़ारिअ मुसम्मन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महजूफ़  
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन 
221  2121 1221  212 

सरकार के जमीन मा नीयत गड़ात हे। 
तरिया सड़क पहाड़ ओ सब ला पचात हे।

गुनवान मन तको इहाँ गदहा बने फिरे। 
गदहा उड़ाय खीर गुनी घाँस खात हे। 

करथन कहे ओ काम कहूँ मेर नइ दिखय। 
चारो डहर विनाश के अँधियार रात हे। 

बन गे रहिस सड़क ह जी कागज सबूत हे। 
चोरी करे हे चोर ह ये साँच बात हे। 

खुद के पता रहे नही का मौत ओ मरे।
सब के भविष्य देख जे रसता बतात हे। 

बचपन ले पाल पोस के जेला करे बड़े। 
बेटा उही ह बाप ल मारत ग लात हे।  

कतको कहे "दिलीप'' कहाँ लोग मानथे।  
 करथे नशा ह नाश तभो ढोंके जात हे।

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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