Tuesday, 1 September 2020

सरसी छंद

बहाव- दिलीप कुमार वर्मा 

जीवन नैया डगमग डोले, हाथ नही पतवार। 
जाने कौन दिशा ले जाये, प्रबल नदी की धार।  

पता नही कब लगे किनारे, हूँ बहाव के संग। 
लिए आश बहता हीं जाऊँ, जमें कहीं तो रंग। 

कभी रुका हूँ कभी बहा हूँ, कभी गिरा पाताल। 
कभी समेटे खुशियाँ सारी, कभी फँसा जंजाल। 

कहीं मिले सावन के झूले, पतझण कहीं बहार। 
कभी अकेले मायूसी तो, मेलों का संसार। 

रहा नही मुझमें वो साहस, जो मैं करूँ विरोध।
धारा के विपरीत बहूँ जो, मुझको भी है बोध। 

इसीलिए बहता हीं जाऊँ, जैसा रहे बहाव। 
सुख दुख सारे लिए समेटे, जीवन की यह नाव। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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