Tuesday, 15 September 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मज़ारिअ मुसमन अखरब महफूफ़ महफूफ़ महजूफ़ 
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफाइलु फ़ाइलुन
221  2121 1221  212 

घर मा हमर खुसर के ओ हमला नचात हे। 
राजा बने हमर बड़ा आँखी दिखात हे। 

अइसन करव उपाय ओ इँहचे ले भाग जय। 
लूटत हवय गरीब ला डण्डा उठात हे।

परदेशिया इहाँ बसे झोरत हे लोग ला। 
लालच दिखा दिखा के सबो खाय जात हे। 

उलझाके हम सबो ल ओ रोटी ग सेंकथे।  
हलवा अपन दहेल के चटनी चटात हे।

फोकट के ओ खवा के बना दे हे कोढ़िया।  
दारू के लत लगा के ओ निर्बल बनात हे। 

रचानाकार-- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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