सुंदरी सवैया
सब पूजत हें भगवान सदा मन आस रखे दर मा सब आथें।
कुछ माँगत हे फल कर्म बिना मिलजाय तहाँ प्रभु ला बिसराथें।
कर ढोंग सबो झन भक्त बने छल के भगवान ल का उन पाथें।
उन भोगत हें यम लोक म जा, जिन पाप करें जलदी मर जाथें।
भगवान बलावत धाम हवे तब लोगन जाय नही घबराथें।
मत लेग अभी हमला कहिके, दर मा दउड़े सब लोगन आथें।
फिर काबर भक्त बने फिरथें,तरना नइ हे बस ढोंग दिखाथें।
रहिथें सब मोह मया म फँसे, बस काम चले ततके गुण गाथें।
जब जानत हे मरना सच हे, फिर काबर लोगन हा घबराथें।
विपदा जब आवत हे तिर मा,लड़ना तक छोंड़ लुका सब जाथें।
रहिथे जिन सागर भीतर मा, उखरो तक मौत कलेचुप आथें।
भुलका म लुका उड़िया कतको, जब मौत लिखे त कहाँ बच पाथें।
कहिथें बड़ सुग्घर स्वर्ग हवे, फिर काबर जाय नही घबराथें।
जब जानत हे दुख हे इहँचे, फिर भी इहँचे रहना सब भाथें।
फिर काबर नाम जपे बिहना,भगवान ल ध्यान म काबर लाथें।
दुख ताप सहे इहँचे रहिके,भगवान जनी उन का सुख पाथें।
रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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