Saturday, 26 September 2020

गजल

 गजल -दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 
मुस्तफ़इलुन मुस्तफ़इलुन 

2212   2212 

आवत हवय मन मार के। 
जावत हवय मन मार के।  

मन देय के नइ हे तभो।
लावत हवय मन मार के।

मँहगा हवय सब साग ता। 
खावत हवय मन मार के।

मन मा उदासी छाय हे। 
गावत हवय मन मार के। 

थक गे हवय कर काम जी। 
धावत हवय मन मार के। 

श्रद्धा नही परसाद मा। 
पावत हवय मन मार के।

बिलवा टुरा हे जान के।
भावत हवय मन मार के। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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