"राम''
राम पूर्ण परमात्मा, सकल जगत आधार।
राम कथा अविराम है, रामायण बस सार।
जो जाने श्री राम को, वह भी है अंजान।
ऐसी लीला राम की, मति जस करे बखान।
जगत पिता श्री राम हैं, जग के पालन हार।
सुख दुख देते हैं वही, करते हैं भवपार।
राम चराचर में बसे, सब हैं उनके रूप।
मन से उज्ज्वल हैं सभी, तन है सभी अनूप।
मेरे प्रभु श्री राम का, लीला अपरम पार।
माया में जो हैं फँसे, समझ सके न सार।
कोई कहता राम तो, रहते हैं आकाश।
अंतर मन ढूंढे नही, जहाँ राम का वास।
सकल जगत को तारने, लेते हैं अवतार।
लीला धर लीला करे, चकित भये संसार।
राम नाम संसार से, तरने को पतवार।
निशदिन जप लो राम को, हो निश्चित उद्धार।
रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
No comments:
Post a Comment