Thursday, 10 September 2020

चौपई छंद

मछरी

मछरी जइसन झन इतराव, बाढ़ देख बाहिर झन जाव। 
देवत हे दुनिया हर घाव, घर मा रहिके जान बँचाव। 

जइसे मछरी हर इतराय, बाढ़ आय मसमोटी छाय। 
सरपट सइया दउड़त जाय, जेती ले पानी हर आय। 

नदिया ले नरवा मा आय, खेत खार तरिया तक जाय। 
देख कोकड़ा बिन-बिन खाय, रहे ढोडिया मूँह दबाय। 

कतको मनखे खेले जाल, बन के मछरी बर ओ काल। 
सब के असने होथे हाल, छोड़े घर ता हो जंजाल। 

सुन रे मछरी कहना मान, नदिया ला अपने घर जान। 
आबे बाहिर छुटे परान, झन बन संगी तँय नादान। 

ये जग हे भारी बइमान, सब के रहते हे सुनसान। 
सब के आगू लेवय जान, कोन अपन नइ हे पहिचान। 

अगर जरूरी जाना तोर, सुन रे मछरी कहना मोर। 
झन करबे रसता मा शोर, चुपके जाबे जइसे चोर। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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