Friday, 25 September 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महजूफ़ 
मुफाइलुन फ़ाइलातुन मुफाइलुन फेलुन

1212  1122 1212  22 

मरे रथे तको मनखे ह वोट डारत हे। 
समझ म आत हे कइसे कका ह हारत हे।   

डकार मार के खादिस हजार टन चाँउर।  
गरीब माँग थे हक ला त मुँह ल फारत हे।

कमाय कुछ नही खाये बखत बने अघुवा। 
कहे जे काम करे मुँह अपन ओ टारत हे।  

बड़े ह मार के चलदिस मरत ले मोला जी। 
तहाँ ले आय हे छोटे गजब के सारत हे।

सबो गड़ाय हे आँखी जी लूट खाये बर।  
समझ रखे हे जी हलुवा ओ देश भारत हे। 

गरीब घर म कहे रोशनी करे परही। 
बने सियान ते जा झोफडी ल बारत हे।

जे सोंचथे करे गलती तको दबा देबो।
हे मीडिया बने हुसियार शोर पारत हे। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

 

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