मुक्तक
2122 2122 2122
रूप चंदा कस जहर भीतर भरे हे।
आज हीरोइन नशा खातिर मरे हे।
कोन जाने कोन फँसही जाल मा जी।
एन सी बी देख ले पाछू परे हे।
माल हो जब जेब में कितना मजा है।
"माल'' पीने का यहाँ मिलता सजा है।
माल आने से चले जो "माल'' रसते।
उन सभी का आज तो बारा बजा है।
माल आया तो मिलाया "माल'' सबको।
"माल''ने है कर दिया बेहाल सबको।
माल आता जेब तो मति फिर ही जाता।
कर दिया है "माल''ने कंगाल सबको।
"हैस गांजा माल'' हीरोइन उड़ाते।
आज लगता है तभी तो नाच पाते।
बेसरम बन के दिखाते जिस्म सारे।
पाक दामन को सदा अपनी बताते।
शेर को गीदड़ बना दे वो हँसी हो।
बाल पन से तुम मेरे अंतर बसी हो।
लाख चारे डाल दी ना काम आया।
आज ऐसा क्या हुआ जो आ फँसी हो।
शेर हिरनी को पकड़ कर रख लिया है।
रक्त इंशानो का जब से चख लिया है।
क्या पता कल डाल चारा फाँस ले वो।
आज के इंशान ने भी नख लिया है।
कर रहे चैलेंज फोटो को दिखा के।
हम कपल हैं बेस्ट लोगों को बता के।
कौन जाने क्या छुपा मुस्कान पीछे।
खींच लाये हैं सभी गम को दबा के।
सोंचता हूँ इस कपल में क्या कमी है।
देखने के वास्ते दुनिया थमी है।
आज बाइस वर्ष से हैं सँग निभाते।
है यही परफेक्ट जो अबतक जमी है।
रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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