Sunday, 27 September 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुरब्बा सालिम 
मुस्तफ़इलुन  मुस्तफ़इलुन 

2212  2212 

बिछिया हवय बड़ काम के। 
बिंदिया हवय बड़ काम के। 

माथा उठे जब दर्द तब।
निदिया हवय बड़ काम के। 

भाजी सुधारे बर बुआ। 
हँसिया हवय बड़ काम के। 

झाड़ी हटाना हे  कभू।  
टँगिया हवय बड़ काम के। 

कोनो अचानक आय ता। 
भजिया हवय बड़ काम के। 

करना हवय आराम ता। 
खटिया हवय बड़ काम के। 

त्यौहार मा पकवान बर। 
गुझिया हवय बड़ काम के। 

जब घर बसाना हे अलग। 
टठिया हवय बड़ काम के। 

अम्मठ बनाना साग हे। 
दधिया हवय बड़ काम के। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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