Monday, 7 September 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा

बहरे मज़ारिय मुसम्मन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महजूफ़ 
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन 

221  2121 1221  212  

इरखा म बस जरत हवे मनखे ह आज के।
आपस म लड़ मरत हवे मनखे ह आज के।

मनखे डरा के भाग थे मनखे ल देख के। 
बिसवास नइ करत हवे मनखे ह आज के। 

सब जानथे गलत सही तब ले झपा जथे। 
लालच म सब परत हवे मनखे ह आज के। 

भव पार जाय बर तो ग बस राम नाम हे
कचरा ले घर भरत हवे मनखे ह आज के। 

रहिथे मुड़ी नवाय ये जाथे जिहाँ सगा।
काखर ले बड़ डरत हवे मनखे ह आज के। 

ताकत सबो सिराय गे कचरा ल खाय के।
पतझड सही झरत हवे मनखे ह आज के। 

जाँगर बचे नही सबो दारू ह ले घले।
बस दाँत ला दरत हवे मनखे ह आज के। 

रचानाकार-- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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