गजल- दिलीप कुमार वर्मा
बहरे मज़ारिय मुसम्मन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महजूफ़
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
221 2121 1221 212
इरखा म बस जरत हवे मनखे ह आज के।
आपस म लड़ मरत हवे मनखे ह आज के।
मनखे डरा के भाग थे मनखे ल देख के।
बिसवास नइ करत हवे मनखे ह आज के।
सब जानथे गलत सही तब ले झपा जथे।
लालच म सब परत हवे मनखे ह आज के।
भव पार जाय बर तो ग बस राम नाम हे
कचरा ले घर भरत हवे मनखे ह आज के।
रहिथे मुड़ी नवाय ये जाथे जिहाँ सगा।
काखर ले बड़ डरत हवे मनखे ह आज के।
ताकत सबो सिराय गे कचरा ल खाय के।
पतझड सही झरत हवे मनखे ह आज के।
जाँगर बचे नही सबो दारू ह ले घले।
बस दाँत ला दरत हवे मनखे ह आज के।
रचानाकार-- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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