सार छंद-- बासी
समे मुताबिक नाम धराये , तीन तरह के बासी।
पहिली बासी दुसरा बोरे, तीसर रहे तियासी।
रतिहा बेरा भात बचे तब, पानी डार रखाथे।
उही बिहिनिया के बासी ये, जे हर सब ला भाथे।
इही हरे ओ असली बासी, जेखर महिमा गाथें।
मही डार के चटनी सँग मा, जेला दुनिया खाथें।
दोपहरी के भात बचे मा, संझा पानी डारयँ।
ते हर बोरे बासी बनथे, भुखहा मन ला तारयँ।
गरमी के दिन बड़का होथे, चार बखत सब खाथें।
बिहना बासी संझा बोरे, खाके सबो अघाथें।
दोपहरी के भात बचे ला, संझा जब नइ खावय।
उही बिहनिया होय तियासी, पचपच ले हो जावय।
अमसुरहा जब रहे तियासी, कोनो मन नइ भावयँ।
नून डार खलखल ले धोके, मही डार सब खावयँ।
बासी हो या रहे तियासी, खावत निदिया आथे।
पर बासी हर सब मौसम मा, सिरतो गजब सुहाथे।
जे नइ खाये ते का जानय, कतका हे गुणकारी।
भात तको ला तिरिया सकथे, खा देखय इक बारी।
बिन बासी खाये गरमी हर, कइसे भला पहाही।
उही बाँचही लू झुलसे ले, जे हर बासी खाही।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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