कुंडलियाँ
शिक्षा देते हैं सभी,पर लेता ना कोय।
बैठे हैं अभिमान में,बाद रहे सब रोय।
बाद रहे सब रोय, समय चलता जो आगे।
पाने को फिर ज्ञान,वही सब दरदर भागे।
गए समय जो चूक,कौन अब देगा दीक्षा।
समय रहे अनमोल,मिले तो लेलो शिक्षा।1।
बच्चा या बूढा रहे,ज्ञान मिले अनमोल।
ज्ञानी को ना आंकिये,उम्र तराजू तोल।
उम्र तराजू तोल, पता ना कुछ पाओगे।
बूढा देगा ज्ञान,समझ गर तुम जाओगे।
कहना अब तो मान,ज्ञान होता है सच्चा।
जाके ज्ञान बटोर,बड़ा ज्ञानी है बच्चा।2।
आकर्षित होते सभी,रूप रंग को देख।
लक्ष्मी जब घर आय तो,गुण को जरा सरेख।
गुण को जरा सरेख,काम इनसे है बनता।
गर होगा कुछ दोष,तभी आँखे है तनता।
रूप रंग को देख,कभी ना होना हर्षित।
गर लक्ष्मी गुणवान,सभी होंगे आकर्षित।3।
राजा का मैं पुत्र हूँ, मुझको चाही राज।
तुम सारे परजा सुनो, करो हमारा काज।
करो हमारा काज,राज हमको लौटादो।
ऐसा करदो वार,विपक्षी को ही खा दो।
कल पढ़ के अखबार,खबर पाये सब ताजा।
कुछ भी करके आज,बना दो मुझको राजा।4।
मुर्दा उसको सब कहे,जिसमें ना हो जान।
तूँ क्यों मुर्दा बन रहा,कर ले कुछ तो मान।
करले कुछ तो मान, नही तो पछतायेगा।
तन होगा बीमार,कहाँ फिर बच पायेगा।
चल फिर कर ले काम,सलामत रख तू गुर्दा।
जिस तन आलस छाय, समझ ओ होता मुर्दा।5।
प्यारे तेरे प्यार में,प्यारी है बीमार।
प्यार उसे तू दे जरा,मत करना इनकार।
मत करना इनकार,नही तो मर जायेगी।
लेकर तेरा नाम,जहर तुरते खायेगी।
पा के तेरा प्यार,रहेगी वारे न्यारे।
मत करना तकरार,प्यार दे अब तो प्यारे।6।
ममता मइ माता रहे,मया लुटावय रोज।
माँ जइसन कोनो नही,कतको ले तँय खोज।
कतको ले तँय खोज,सरग मा तक नइ पाबे।
माँ होथे अनमोल,पूछ ले जेती जाबे।
मौसी नानी जेन,रहय नइ काँही समता।
सागर कस भरपूर,मया मइ माई ममता।7
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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