Saturday, 6 April 2024

दर्पण

चौपाई छंद -- दर्पण  

पहुँच गेवँ दर्पण करा, मन मा रखके आस। 
मन जइसन सूरत दिखा, दर्पण होय उदास।1।

दर्पण देखत रहिगे मोला। बोलिस काय दिखावँव तोला।
जइसन इच्छा तँय ले आये। तइसन मोसे हो नइ पाये।  

जइसन आके सबझन करथें। रंग अपन मुखड़ा मा भरथें। 
तहूँ अपन सूरत चमकाले। मन चाहा आकर्षण पाले। 

अनगढ़ सूरत कोन सरेखयँ। अंतस मन कोनो नइ देखयँ।  
दुनिया देखत हवयँ दिखावा। अपन मुखौटा खुदे लगावा।

मँय सिधवा बपुरा बेचारा। हावँव मँय किस्मत के मारा। 
मोला उल्लू सबो बनाथें। रहिथें दुसर दुसर बनजाथें। 

खखल बखल सूरत धर आथें। आघू आके बड़ इतराथें।
आँखी फार निहारयँ मोला। काय बतावँव मँय हर तोला।

नाक नक्श नइ रहे ठिकाना। पर हीरोइन झट बन जाना।
करिया मन गोरी हो जाथें। देखत मोला रूप सजाथें। 

कंघी ले सब बाल सवारयँ। फिर मुखड़ा पौडर मल डारयँ। 
आँखी मा फिर आँजय कजरा। कतको बाल लगावयँ गजरा।  

माथा मा टिकली चटकावयँ। अउर होठ मा महुर लगावयँ। 
गाल गुलाबी रँग रँगडारयँ। भौं पातर करिया रँग मारयँ। 

मँय जानत हँव का हे मन मा। पर का दिखत हवय जी तन मा।  
मँय दर्पण पर बोल न पावँव। जेन दिखत हे उही दिखावँव। 

मोरो तो हावय मजबूरी। सच ले बना रखत हँव दूरी।  
कहुँ मनखे दर्पण बन जाही। अंतस का हे तेन दिखाही।।

अंतस के नइ हवय पुछारी। मांग दिखावा के हे भारी। 
बइठ सजाले मुखड़ा भोला। का का कमी बतावँव तोला।

अपन मुताबिक साज ले, कर सोलह श्रृंगार। 
कमी दिखे ते दूर कर, चाँद लगा मुख चार।2।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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