Monday, 12 April 2021

सखी छंद


नोनी के महतारी सुन।
नोनी खातिर कुछ तो गुन।
रसता ओखर बढ़िया चुन।
पढा लिखा के जिनगी बुन।

इसकुल ये सरकारी हे।
पढ़े इहें सब नारी हे।
फिर का के लाचारी हे।
अब नोनी के बारी हे।

सबके भाग जगावत हे।
लिखे पढ़े सिखलावत हे।
ज्ञान सबोझन पावत हे।
नान नान सब आवत हे।

अब तो तँय देरी झन कर।
तइयारी करले सुग्घर।
नाम लिखा थोरिक झन डर।
नाम कमाही ओ जब्बर।

पुस्तक कपड़ा ओ पाही।
खाना तक इहँचे खाही।
बिहना ले इसकुल आही।
संझा बेरा घर जाही।

सखी सहेली मिल जाही।
खेले कूदे बर पाही।
भाग अपन ओ सहराही।
तोरे गुन ला ओ गाही।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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