माटी के कहना ला मान।
काय कहत हे सुनव सुजान।
देवय बोरा बोरा धान।
पर पहिली करलव पहिचान।
माटी हे ता धरती जान।
पथरा के का हे पहिचान।
करलव एखर सब सम्मान।
कर देथे ये पूरा दान।
जादा खातू झन तँय डार।
माटी हो जाथे बेकार।
जैविक हा करथे उपचार।
गोबर खातू ला तँय डार।
करिया माटी सोना ताय।
रंग रंग के फसल उगाय।
अरहर कपसा धान उगाव।
भारी उत्पादन ला पाव।
भुरुवा माटी सब ला भाय।
घर ईंटा खपरा बन जाय।
मूरत बर्तन बने बनाव।
घर कुरिया छाबे बर लाव।
माटी महिमा अपरम पार।
माटी मिलथे घर बन खार।
माटी ले हावय संसार।
माटी जीवन के आधार।
माटी के ये तन ला जान।
माटी मुर्दा एक समान।
जीयत भर के हे अभिमान।
माटी देवय मरे तहाँन।
पथरा बनना हे बेकार।
छीनी मा बड़ देवय मार।
माटी असन नरम हे सार।
गूँथ गूँथ सब देवय प्यार।
माटी ला तन लेप लगाय।
पोत पोत चिक्कन तन पाय।
बीमारी ला दूर भगाय।
तन शीतल पा मजा उड़ाय ।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
27-8-2019
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