इसकी उसकी सब की सुन ली,अब अपनी है बारी। खाली कुर्सी पड़ी हुई है,जिनकी है लाचारी।
चार पाँव रखते हैं लेकिन,खुद से चल ना पाये।
उसको भी लेजाने वाला,सुबह सुबह ही आये।
तबतक धीरज धरके कुर्सी,सुनते सबकी बानी।
जिसको समझ न आया सारे,चले गए घर जानी।
अपनी भाषा क्या समझेंगे,जो देते हैं ताली।
शांत चित्त से जो सुख पाते,ओ हैं कुर्सी खाली।
हा-हा हा-हा हँसने वाले,भला मरम क्या जाने।
कविता में क्या है गहराई,कैसे ओ पहचाने।
सार छंद में सार बात को,सहीं सहीं कहते हैं।
जो सकझेंगे अपनी बानी,वही यहाँ रहते हैं।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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