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शहर के चकाचौंध ले दूर हे।
जिहाँ जिंदगी जान भरपूर हे।
कहे गाँव ओला सगा मान ले।
हँसी हे खुशी हे उहाँ जान ले।
ददा हे बबा हे कका हे इहाँ।
रहे डोकरी एक दाई जिहाँ।
रहे संग भइया ग भौजी रहे।
करे काम काकी कका जे कहे।
हँसी अउ ठिठोली म लेले मजा।
बबा जे कहे मान झन तँय सजा।
इही रंग हावय इहाँ गाँव के।
मजा पाय परिवार के छाँव के।
सगा देख तरिया म पानी भरे।
इही मेल खातिर ग जरिया हरे।
नहाये इहाँ तो सबो आय जी।
बुता काम के बात बतलाय जी।
जिहाँ लीम आमा पीपर छाँव हे।
रहे बर ग गस्ती उही गाँव हे।
ददरिया सुनावत रहे खार मा।
रँभावय ग गरुवा ह कोठार मा।
दही दूध के जान गंगा बहे।
उहें देवता मन ह आके रहे।
तभे गाँव ला गाँव कहिथे सगा।
अपन भाग आके इहाँ तँय जगा।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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