गजल
बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़जू आखिर
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ा
212 212 212 2
नेक मनखे तको हर हपटथे।
देख लोगन ल तुरते सपटथे।
मान कतको जलनहा इहाँ हे।
देख बाढ़त त रसता खपटथे।
भाग मा जब लिखाये अँधेरा।
साफ अम्बर म बादर घपटथे।
मुँह म रोटी रखे हाँस झन तँय।
आय चुपके बिलइया झपटथे।
देख के तोर दौलत भराये।
चोर सिधवा बने चुप लपटथे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
No comments:
Post a Comment