बाल गीत।
बोली
भों-भों कुत्ता भौंक रहा है।
अपनी ताकत झोंक रहा है।
क्या कहता कुछ समझ न आए।
सायद कुछ वो दूर भगाए।
माँ-माँ गइया की है बोली।
दूध दही से भर दे झोली।
बच्चे को वो देख रँभाती।
दूध पिलाने घर में आती।
म्याऊँ-म्याऊँ बिल्ली मौसी।
बन करके ओ रहे पड़ौसी।
दबे पाँव ओ घर में आती।
दूध दही सब चट कर जाती।
काँव-काँव कर सोर मचाए।
सुबह सवेरे छत पे आए।
कौवे को कोई ना भाये।
लूट-लूट रोटी ओ खाये।
पिंजरे अंदर बैठा तोता।
चुपके-चुपके निशदिन रोता।
पंख कटे चलता है हौले।
इंसानों की बोली बोले।
कुकरुस कूँ मुर्गा है बोले।
हुई सुबह अब तो मुँह धोले।
चिड़िया चिंव-चिंव गीत सुनाती।
आँगन में आ हमे जगाती।।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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