Friday, 31 July 2020

गजल

गजल

2122  2122 2122  212 

बात मतलब के कहत हँव पर समझ नइ पाय हे। 
झूठ के बेसन सनाये अंग भर लपटाय हे।  

जिंदगी भर कर गुलामी मुँड़ नवाये बीत गे। 
छोड़ देवत हे कुकुर बर तेन ला ओ खाय हे। 

मार खावत रात दिन मुँह ले तको उफ नइ करे। 
तेन ला मालिक बना करना गुलामी भाय हे। 

शेर जइसन गर्जना हाथी असन हे देह जी। 
पर बिचारा मुड़ नवाये बन रहत ओ गाय हे। 

लागथे गांधी बबा के तीन बन्दर आ फँसे।
सुन सके ना कह सके देखत तको घबराय हे। 

छोड़ दे अब तो गुलामी गाँव घर सब तोर जी।  
जाग जा पढ़ लिख बने तोला बताये आय हे। 

घोर अँधियारी मिटाये तोर जीवन ले सखा। 
देख बिहना ले सुरुज हर धूप सुग्घर लाय हे।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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