लावणी छंद- दिलीप कुमार वर्मा
भाई रोवत रोवत बइठे, बहिनी हर समझावत हे।
बबा मरय नइ सुन ले भाई, रूप बदल के आवत हे।
कँउवा बनके देख अटारी, काँव काँव चिल्लावत हे।
तोर हाथ के रोटी पीठा, लूट लूट ओ खावत हे।
बबा बने हे राम चिरइया, राम नाम दुहरावत हे।
तोला सुग्घर गीत सुनाये, तोर तीर मा आवत हे।
बादर घपटे बिजुरी चमके, तभो बबा हर आवत हे।
मोर बने तब हमर बबा हर, सुग्घर नाच दिखावत हे।
घर के रक्षा तको करे बर, कुकुर बने घर आवत हे।
छोड़न छाड़न भले खाय पर, भूँकत चोर भगावत हे।
रात होय तब बन के चंदा, मंद मंद मुस्कावत हे।
तोर रूप ला देखे खातिर, खिड़की कोती आवत हे।
हमर बबा दुरिहा नइ जावय, बहिनी हर समझावत हे।
सुत जा भाई कहिके बहिनी, लोरी सुग्घर गावत हे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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