गजल
बहरे हजज़ मुसम्मन सालिम
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
1222 1222 1222 1222
मया माटी ले करले तँय, मरे मा काम ये आही।
दबे जब देह माटी मा, सरे मा काम ये आही।
रखव लाठी बड़े घर मा, बने मजबूत तक होवय।
घुसे जब चोर घर भीतर, छरे मा काम ये आही।
पपीता आम नीबू जाम केरा अउ लगा छीता।
अपन बारी लगा राखव, फरे मा काम ये आही।
अभी बारिश चलत हावय, रखव सब तेल माटी के।
रथे लकड़ी सबो गीला, बरे मा काम ये आही।
बना बांधा कुँआ तरिया,नदी तक बांध के राखव।
गिरे बरसात के पानी, भरे मा काम ये आही।
कहूँ जाना हवय रतिहा, रखव हनुमान चालीसा।
सुने आवाज घुघवा के, डरे मा काम ये आही।
सबो घर मा रखाये हे , खरीदे जेन बोरो प्लस।
कहाँ हावय रखव सुरता, जरे मा काम ये आही।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
No comments:
Post a Comment