कुंडलियाँ- दिलीप कुमार वर्मा
किसानी
जाँगर पेरव आज सब, तभे बने सब काम।
दिन खेती के आय हे, झन करहू आराम।
झन करहू आराम, समे चल देही भाई।
बिगड़े जम्मो काम, होय भारी करलाई।
बइला संग मितान, चलव अब धरलव नाँगर।
खेती के दिन आय, जोंत के पेरव जाँगर।1।
दाई रपली ला धरे, ददा धरे हे धान।
बाई रोटी धर चले, सबझन हरे किसान।
सबझन हरे किसान, संग मा करय कमाई।
सुमता मा परिवार,काम तब होवय भाई।
जुरमुल सब सिरजाय, कहाँ फिर हो करलाई।
बेटा जोतय खेत, काँद ला छोलय दाई।2।
बादर घपटत आय हे, हवा चलत हे जोर।
दिन होगे अँधियार कस, झिंगुरा के बस शोर।
झिंगुरा के बस शोर, गूँज गे धनहा डोली।
बेरा बुड़ती देख, जीव सब खुसरे खोली।
दे नाँगर अब ढील, फइल गे करिया चादर।
दिखे नही अब राह, घपट गे के करिया बादर।3।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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