जयकारी छंद
गलवान
चलव दिखाथौं मँय गलवान, ये भारत के सीमा जान।
घाटी हमर हवय पहिचान, भारत माँ के राखय मान।
पर्वत घाटी के भंडार, दुश्मन हर नइ आवय पार।
सुन्ना जिहाँ लगय संसार, जिहाँ नदी के बाढ़े धार।
जाड़ा मौसम बरफ ढँकाय, सादा सादा दुनिया ताय।
जाड़ लगे हाड़ा गलजाय, घाँस तको कुछ नजर न आय।
अइसन दुनिया ला तँय जान, फँस जाबे ता मरे बिहान।
तिहाँ सिपाही रहिथे मान, देश सुरक्षा बर दय जान।
हमर परोसी चीनी देश, जे हर देवत हवय कलेश।
हमर मान ला देवय ठेश, करे मितानी बदले भेष।
बन ब्यापारी इहँचे आय, लाख करोड़ी माल कमाय।
सेना फिर सीमा दे लाय, हमर जगा ला अपन बताय।
देख चीन के ये ब्यवहार, हमर देश नइ मानिस हार।
सेना देइस तुरत उतार, कतको झन ला देइस मार।
पहुँचे खातिर सड़क बनाय, सुविधा तहाँ धका धक जाय।
देख चीन अबड़े घबराय,डेरा घाटी तीर जमाय।
धक्का मुक्की होइस जोर, घाटी दहलय होवय शोर।
बिन हथियार लड़िन हे घोर, नदिया मा देइन हे बोर।
बीस सिपाही हमर शहीद, पर नइ छोड़िन हावय जिद्द।
चालीस उखर देइन हे मार, चीन हटिस फिर मानत हार।
अब तो संगी मानव बात, दिखलादव चीन ल अवकात।
वस्तु चीन के देवव छोड़, अपन देश सँग नाता जोड़।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
एक बार जरूर पढ़ें।धन्यवाद
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