Friday, 3 July 2020

सार छंद

सार छंद  (परदा)  

पुरखा मन के नियम धियम ला, आज कोन हर मानय। 
नवा बहुरिया तको आजकल, दकियानूसी जानय। 

परदा प्रथा हटाये खातिर, उदिम करिन हे भारी। 
युग बदले पर नियम न बदले, आज तलक हे जारी। 

उही नियम ला टोर बहुरिया, बीच समाज म आगे। 
पुरखा मन के नियम धियम ला, जम्मो आज भुलागे। 

बात करत हे बड़का मन ले, बइठ संग ओ जावय। 
अपन काम ओ स्वयम करत हे, नारी मान बढ़ावय। 

अच्छा काम करे जब कोई, लोग करत हें चारी। 
घर मा आवय सास ससुर ले, खाय बहुरिया गारी। 

लोक लाज ला आगी बारे, करथच बड़ा सियानी। 
सभा बीच मा बोलत रहिथस, का मर गेहे पानी। 

लुगरा छोड़े सूट पहिथस, लाज तको नइ लागय। 
सुना सुना के लोगन मन सब, व्यंग बाण ओ दागय। 

कहय बहुरिया सुनव ससुर जी, होगे रीत पुराना। 
अब तो बेटी काम करत हे, आये नवा जमाना। 

बिना बात के बड़का मन ले, कइसे काम चलाहूँ। 
घूँघट डारे रहि जाहूँ ता, कइसे फरज निभाहूँ। 

कोन कहत का बात हवय ओ, बात चूल मा डारव। 
मोर तरफ ले चिंता छोड़व, मन से अब झन हारव। 

रखव तनिक विस्वास मोर मा, काम तभे बन पाही।  
तुँहर तरफ ले छूट मिले तब, परदा आड़ न आही। 

बेटी चाहे रहे बहुरिया, आज काम सब करथें। 
समे परे ता बेटा बनके, घर के चिंता हरथें। 

आज हमूँ ला सोंच बदल के, काम देखना चाही। 
तभे बहू बेटी मन हमरो, मान जगत मा पाहीं। 

महूँ मानथौं मान घटय मत, काम सबो बनजावँय।
थोरिक दूरी रखे चलँय फिर, आँच तनिक नइ आवँय।

मरियादा हर अपन जगा हे, थोरिक उहू निभावँय।
बेटी हो या रहय बहुरिया, समे म आवँय जावँय।

परदा तक हर रहे सलामत, काम तको हो जावय।
पल्लू मुँड़ मा ढाँक रखँय फिर, मान बड़े ले पावय।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

No comments:

Post a Comment