Wednesday, 8 July 2020

गजल

गजल 

बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़जु आख़िर 
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ा
212 212 212 2 

बंद मुट्ठी हवय खोलबे झन। 
देख फोकट के तँय बोलबे झन।    

देह हाड़ा बचाये हे दारू।
बस हवा के चले डोलबे झन।  

ज्ञान के बात मोला न आवय। 
शब्द ला मोर तँय तोलबे झन। 

आज कल बम हे गोटी सरीखे।
तँय चना जान के फोलबे झन। 

तेज तर्रार हे तोर भौजी। 
मान सिधवी समझ ठोलबे झन। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़



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