दोहा- दिलीप कुमार वर्मा
सब हैं 'मैं' के बस यहाँ, 'हम' को मारे लात।
'हम' है अपने साथ तो, 'मैं'की क्या अवकात।1।
सदा अकेला 'मैं' रहा, रख मन में अभिमान।
'हम' को ढूंढे अंत मे, भनक पड़े ना कान।2।
'हम' से की सुरुवात थी, बना रहा पहिचान।
सफल हुआ 'मैं' आ गया, मन मे भर अभिमान।3
मिले सफलता कब तलक, जो 'हम' से है दूर।
आये शरणागत सदा, 'मैं'होकर मजबूर।4।
दूर न 'हम' से जाइए, भले बड़ा हो नाम।
'मय'का प्याला छोड़ दो, बन जाये सब काम।5।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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