Thursday, 16 July 2020

गजल

  गजल 

बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम 
मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन 

1222 1222 1222 1222 

जिहाँ देखव तिहाँ हरियाय धरती आज सावन मा। 
किसानी हर तको भदराय होवत काज सावन मा।  

चमक चम चम चमकथे रोज बिजुरी सँग घटा आके।
दिखाके चाल मारत हे, गिरा के गाज सावन मा।

घटा घनघोर छाये हे जवानी मोर मा आये।
उठा के पाँख नाचत हे, तनिक नइ लाज सावन मा।

बहुत तनहा गुजरथे रात जागत रहि जथौं साथी।
बुलाले तँय कभू दे के तनिक आवाज सावन मा। 

कभू सर्दी कभू खासी उदासी हे कभू भारी।
सबो ले स्वस्थ हो जाथन, पता का राज सावन मा।  

भले सावन महीना हर रथे पावन महीना जी।
मगर जे हे मछरगिद्धा न आवय बाज सावन मा। 

चढाले जल उठा काँवर अगर भोले मनाना हे। 
लगे हे रेम मंदिर मा भगत के आज सावन मा। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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