गजल
बहरे हज्ज़ मुसम्मन सालिम
मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन
1222 1222 1222 1222
अमर होगे हवय कतकोन सेवा देश के कर के।
लिखाये नाम सोना मा गये जब देश बर मर के।
पहिर के खाल गीदड़ शेर के दादा बने रहिथे।
दबे रहिथे सबो नइ खोल पावय मूँह ला डर के।
न भालू हे न बन्दर हे मदद बर राम करही का
तभे तो आजकल रावण सिया ला ले जथे हर के।
सड़क मा होय दुर्घटना मदद कोनो कहाँ करथें।
बचे कानूनी पचड़ा ले सबो मनखे उहाँ टरके।
लगाके पेंड़ बिहना कन खिंचा फोटो दिखावत हे। सँझाती साफ कर देथे तहाँ ले गाय हा चर के।
रचनाकार- दिलीप कुमर वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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