Wednesday, 20 November 2019

लावणी

लावणी छंद

बने रहिस ओ दिन हा संगी,लोटा धर बाहिर जावन।
इही बहाना खेत खार ले,तिवरा भाजी धर लावन।

मेड पार के ओधा बइठे,तिवरा के बटकर टोरन।
पोट्ठा पोट्ठा राहेर ल तब,टोर टोर लोटा जोरन।
पेंड़ तरी मा बइठे बइठे,मीठ मीठ बोइर खावन।
बने रहिस ओ दिन ओ दीदी,लोटा धर बाहिर जावन। 

संझा बेरा मूड़ कोर के,सखी सहेली सँग जावन।
नवा नवा लुगरा अउ गहना, संगी मन ला दिखलावन।
लोटा धर भाँठा मा बइठे, सुख दुख सबझन बतियावन।
इही बहाना

नवा बहुरिया जब घर आवय, सास संग बाहिर जावय।
गाँव गली तरिया अउ नदिया,देख देख बड़ सुख पावय।
परिचय होवय नवा सखी सँग,इही बहाना मिल पावन।
बने रिहिस ओ

नल जल अउ शौचालय ला के,हमला घर खुसरा करदिन।
तरिया नदिया खेत छूट गे, बाहिर जाना सब हर लिन।
सखी सहेली के बिन दीदी,बइठे बइठे पछतावन।
बने रिहिस

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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